ऑनलाइन दवाओं की बिक्री पर लगायी रोक, नियमों के उल्लंघन के चलते लगे आरोप|

नई दिल्ली : मद्रास हाईकोर्ट ने सोमवार को सरकार से ऑनलाइन दवाओं की बिक्री पर रोक लगाने के साथ जनवरी 2019 तक ऑनलाइन बिक्री से संबंधी नियमों को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है. और तामिलनाडु केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट एसोशिएशन द्वारा जारी एक रिट याचिका पर जस्टिस पुष्पा सत्यनारायण की पीठ ने यह फैसला सुनाया.

इसके पहले 13 दिसंबर को त्वचा रोग विशेषज्ञ जहीर अहमद की जनहित याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने भी दवाओं की ऑनलाइन बिक्री पर रोक लगा दिया था. जहीर ने अपनी याचिका में कहा था कि ऑनलाइन दवा विक्रेताओं द्वारा औषधि और प्रसाधन अधिनियम, 1940, औषधि और प्रसाधन नियम, 1945 और फार्मेसी अधिनियम, 1948 के नियमों को ताक पर रखकर दवाएं बेची जा रही है. और बिना उचित प्रक्रिया के बेची जा रही इन दवाओं से मरीजों के साथ-साथ डॉक्टरों के लिए मुसीबत बढ़ रही है.

सरकार दवाओं के ऑनलाइन बिक्री के संबंघ में उचित कानून नहीं बना रही है. हालांकि सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के तरफ से सितंबर में इसके लिए एक ड्रॉफ्ट प्रस्तुत किया जा चुका है, जिसमें दवाओं के ऑनलाइन बिक्री से संबंधित निम्न निर्देशों को जारी किया गया है.

किसी भी ई-फार्मेसी कंपनी को दवाओं के बिक्री के लिए केंद्रीय प्राधिकार के पास पंजीकरण करवाना होगा और कंपनी को लगभग 50 हजार का शुल्क देना होगा. पंजीकरण तीन वर्ष की अवधि के लिए मान्य होगा, जिसे बाद में रिन्यू कराया जा सकता है.

  • कोई भी ई-फार्मेसी किसी विशेष दवा का विज्ञापन नहीं केरगा.
  • मादक दवाओं और आदत पड़ने वाली दवाओं की बिक्री वर्जित होगी
  • दरअसल देश में दवाओं की बिक्री संबंधित सभी प्रमुख कानून औषधि और प्रसाधन अधिनियम, 1940, औषधि और प्रसाधन नियम, 1945 और फार्मेसी अधिनियम, 1948 जब बने थे, तब ऑनलाइन बिक्री चलन में नहीं थी. जिस कारण ऑनलाइन दवाओं की बिक्री किसी कानून के अंतर्गत नहीं आती है. हालांकि 2015 में भारत के ड्रग कंट्रोलर जनरल में दवाओं की बिक्री में जनता के स्वास्थ्य को ध्यान में रखने का निर्देश दिया था.

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