गोल्ड मूवी रिव्यू – जुनून,जज़्बा और देशप्रेम का मिश्रण

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गोल्ड – मेरी नज़र से

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खिलाड़ी अक्षय कुमार के दिन आजकल बहुत बढ़िया चल रहें  हैं | इमोशन का तड़का और कॉमेडी मसाला दोनों मिक्स करके जनता के सामने परोसने में वो माहिर हो चुके हैं |सबसे खास बात अब अक्षय कुमार जान चुके हैं  कि जनता उनसे क्या उम्मीद करती है | अभी हाल में रिलीज हुई गोल्ड कुछ ऐसी ही मूवी है | रीमा कागती ने जब हॉकी पर आधारित इस फिल्म को बनाने की घोषणा की तो लगा कि शायद कुछ नया कॉन्सेप्ट होगा | मगर अफ़सोस रीमा कागती ने इस फिल्म को बनाने से पहले होमवर्क बिल्कुल नहीं किया और [read more=”Click here to Read More” less=”Read Less”] सिर्फ अक्षय कुमार पर दाँव खेल गयीं | अक्षय कुमार और साथी कलाकारों ने एक्टिंग अच्छी की है पर फिल्माने का तरीका लगभग-लगभग पुराना ही है |  फिल्म देखकर ऐसा लगता है कि जैसे बासी पराठे पर देशभक्ति का बटर लगाकर , इमोशन के अचार के साथ जनता को खिलाया जा रहा है |

रीमा कागती की यह फिल्म देखते हुए आपको चक दे इण्डिया की याद तो आएगी ही साथ ही साथ लगान और ग़दर की याद भी आ सकती है | उन्होंने भारतीय हॉकी टीम द्वारा 1948 ओलम्पिक में गोल्ड जीतने की सच्ची कहानी को कमजोर स्क्रीन प्ले में प्रस्तुत कर फिल्म समीक्षकों को निराश किया | फिल्म में अक्षय कुमार  ने बंगाली हॉकी मैनेजर तपन दास का रोल प्ले किया है जो शराब भी पीता है ,जुआ भी खेलता है ,अपनी पत्नी के जेवर भी बेच देता है परन्तु बहुत बड़ा  देशभक्त है | भले शराब पीकर गटर में बेहोश पड़ा हो लेकिन उसकी आँखों में देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने का ख्वाब है जो दर्शकों का आकर्षण बनता है | फिल्म में मौनी रॉय ने अक्षय कुमार की पत्नी के रोल में बढ़िया काम किया है हालाँकि उनके प्यार और गुस्से के टाइमिंग का कुछ पता नहीं चलता | वो अपने पति को हड़काते हुए रोल में अधिक जँची हैं और वो ऐसी पत्नी हैं जिनको अपने पति भर भरोसा रत्ती भर भी नहीं है पर प्यार बहुत है |  कुणाल कपूर अपने रोल में पहले से ज्यादा जँचे हैं ,अमित साध ,सनी कौशल,विनीत कुमार ने भी एक्टिंग अच्छी की है | गाने ठीक हैं पर कोई ऐसा नहीं है जो आपको याद रहे ,हाँ ‘चढ़ गयी’ गाने पर अक्षय कुमार का धोती ऊपर उठा कर कमर मटकाना आप जरूर याद रखेंगे |

खेल भावना और भाई चारा दिखाना फिल्म का हिस्सा था, अतः दिखाया गया | विभाजन की त्रासदी ,ब्रिटेन के खिलाफ पकिस्तान और भारत के खिलाड़ियों का गुस्सा ,200 साल की  गुलामी का दर्द,विभाजन के बाद ओलम्पिक के लिए दूसरी टीम की तैयारी ,बौद्ध आश्रम में टीम की ट्रेनिंग,अक्षय का लन्दन में टीम के साथ न जाना फिर दोबारा एंट्री , बहुत कुछ था जिसमें कुछ जरुरी पर कुछ नाटकीय लगा  | फिर भी  अक्षय कुमार का जूनून और जज्बात जनता को बाँधे रखता है | अंतिम 15-20 मिनट में खेल का रोमांच है जिसे महसूस करके आप कई बार सीट से उछल सकते हैं ,गौरवान्वित होने का अवसर भी मिलेगा | अंत वही होता है जो आपको शुरू से पता है |

नयापन कुछ नहीं है पर मनोरंजन की दृष्टि से फिल्म ठीक-ठीक है |खेलप्रेमियों और देशप्रेमियों को थियेटर जाकर दो-तीन  सौ रुपये खर्च करने में नहीं खलेगा क्योंकि देशभक्ति और भावनाओं की बात है |अगर आप अक्षय कुमार के फैन हैं तब तो आप से कोई डिबेट ही नहीं किया जा सकता और यहीं कहा जा सकता है आप निश्चित ही यह फिल्म देंखें |  अब  अगर मुझे इस फिल्म को नंबर देने के लिए कहा जायेगा तो पाँच में से तीन नंबर देने में जरा भी कंजूसी नहीं करूँगा |

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–विनोद पांडेय

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