मंटो के जीवन में बदनामी, शोहरत के चार कदम आगे चलती थी | क्या नवाजुद्दीन सिद्दीकी ही इस भूमिका के लिए सबसे उपयुक्त एक्टर साबित होंगे ?

बॉलीवुड में बहुत कम ही ऐसे लोग हैं जो संजीदा मुद्दों,घटनाओं या सवेंदनशील व्यक्तियों के जीवन पर फिल्म बनाने का रिस्क उठाते हैं | नंदिता दास एक ऐसे ही ब्रेव डायरेक्टर के रूप में उभर कर आयी हैं | उनकी आगामी फिल्म मंटो उर्दू के लेखक सआदत हसन मंटो के जीवन पर आधारित है | इस फिल्म में मंटो के रोल में नवाजुद्दीन सिद्दीकी है जो अपने बेहतरीन एक्टिंग के लिए जाने जाते है | फिल्म रिलीज होने से किताब को लेकर विवाद में आ गयी,अब देखना है आगे क्या होता है |

वैसे मंटो आजकल फ़िल्मी पंडितों के जुबान पर छायी हुई है कारण यही है कि विवादित उर्दू लेखक मंटो की जीवनी और घटनाओं के साथ फिल्म में कितना न्याय हुआ है ,यह सभी जानना चाहते हैं | नवाजुद्दीन सिद्दीकी के आवाज में जो कशिश है ,आँखों में जो जूनून दिखता है वो एक संघर्षशील व्यक्ति की भूमिका में जान तो फूँक सकता है पर क्या इतना काफी है मंटो का किरदार जीने के लिए ? शायद इसका जवाब इस वीकेंड पर इस फिल्म को देखने के बाद ही मिल पायेगा |

एक नजर मंटो के जीवन पर डालें तो सआदत हसन मंटो का जन्म 11 मई 1912 को भारत में हुआ था ,बाद में विभाजन के बाद वो पाकिस्तान चले गए | मंटो उर्दू के बड़े प्रसिद्ध लेखक हुए पर बहुत विवादित भी रहे | मंटो का व्यक्तिगत और साहित्यिक जीवन बड़ा ही संघर्षपूर्ण रहा | कहानियों में अश्लीलता फ़ैलाने का आरोप कई बार लगा | खूब अदालत के चक्कर के काटने पड़े | मामला साबित नहीं हो पाया पर परेशानियों ने मंटों का पीछा जीवन भर नहीं छोड़ा | वैसे तो मंटो ने बहुत कहानियाँ और लघुकथाएँ लिखी पर इन्हें विशेष रूप से बू, धुंआ,खोल दो, ठंडा गोश्त,काली सलवार, ऊपर, नीचे और दरमियां और चर्चित टोबा टेकसिंह के लिए अधिक जाना जाता है | 18 जनवरी 1955 को महज 42 साल की उम्र में पाकिस्तान के लाहौर में मंटो का देहांत हो गया |विडंबना देखिये जिस लेखन कार्य के लिए पाकिस्तान में उन पर मुकदमें चले ,उसी काम के लिए मंटो को 2012 में पाकिस्तान में निशान -ए -इम्तियाज पुरस्कार से नवाजा गया |

अपनी लेखनी से समाज के छुपे हुए कृत्यों को उजागर करने के लिए मंटो जाने जाते थे | उनका कहना था समाज ही तो व्यक्ति और साहित्य को बनाता है | उस समय मंटो की बदनामी उनके प्रसिद्धि के आगे -आगे चलती थी | समाज की विसंगतियों पर उनकी बहुत पकड़ थी और बात को सीधे-सीधे कहने के आदी थे जो उस समय के साहित्यकारों को भाती नहीं थी | आज उनकी कही हुई बात अधिक प्रासंगिक लगी तो नंदिता दास जैसे उम्दा कलाकार ने मंटो पर फिल्म बनाने का जज्बा दिखाया | फ़िल्मी समीक्षकों ने इस फिल्म को अच्छे मार्क्स दिए है अब देखना है कि नवाजुद्दीन सिद्दीकी अपने मंटो के किरदार से दर्शकों को कितना रिझा पाते है | आज की पीढ़ी मंटो की बेबाकी और स्पष्टवादी लेखक व्यक्तित्व और उनके जीवन संघर्ष से क्या सीख पाती है ,यह आने वाला वीकेंड बताएगा |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *