पितृ पक्ष में पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करना ही असली श्राद्ध है

हम सब इस धरती पर आयें हैं इसमें सबसे अधिक योगदान हमारे माता-पिता का होता है | हमारे माता-पिता पृथ्वी पर अपने माता-पिता के माध्यम से आएं थे | हमारे से पहले के लोग पूर्वज कहलाते हैं | हिन्दू धर्म की धार्मिक आस्था और लोक मान्यता के अनुसार पूर्वज भी भगवान होते हैं और हर साल पंद्रह दिन के लिए उन्हें याद किया जाता है ,श्राद्ध किया जाता है ,दान किया जाता है | जो पंद्रह दिन पितरों के लिए निर्धारित है उसे हम पितृ पक्ष कहते हैं | पितृपक्ष में पितरों को जल अर्पण करते हैं ,श्राद्ध करते हैं और उन्हें स्मृति में रखकर दान देते हैं | इस प्रयोजन के पीछे यही उद्देश्य होता है कि पितरों की आत्मा को शांति मिले और उनके आशीर्वाद से उनकी वर्तमान पीढ़ी सुखी और समृद्ध रहे |



पितृपक्ष में उस तिथि पर पूर्वज का श्राद्ध करते हैं जिस तिथि को उनका देहांत हुआ होता है | अगर किसी पूर्वज की तिथि मालूम नहीं है तो अमावस्या को उसका श्राद्ध किया जाता है | पितृ पक्ष इस वर्ष 24 सितम्बर से 8 अक्टूबर तक है |हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध करने वाला व्यक्ति जनेऊ धारण करता अवश्य करता हो और श्राद्ध सम्बन्धी हर कार्य दक्षिण की ओर मुँह करके ही संपन्न करना चाहिए | श्राद्ध वाले दिन या संभव हो तो पूरे पितृ पक्ष तक लहसुन ,प्याज जैसे तामसी चीजों का परित्याग करना चाहिए | कुछ लोग भोजन का प्रथम अंश कुत्ते या कौवे को भी खिलाते हैं |



पितृ पक्ष के पीछे मूल धारणा यहीं है कि लोग अपने पूर्वजों को याद करें ताकि पूर्वजों की आत्मा उन्हें आशीर्वाद दे | संभव है इन बातों के पीछे यह भी हो कि पितृपक्ष में पितरों को श्राद्ध और सम्मान देकर पूर्वजों के बताये हुए सही रास्ते पर चलकर जीवन में सुख और शांति प्राप्त किया जा सकता है जिसके लिए पहले के मनुष्यों ने इसे धार्मिक आस्था से जोड़ दिया | श्राद्ध भी श्रद्धा से जुड़ा है अतः यह सबसे महत्वपूर्ण है कि हम अपने पूर्वजों को श्रद्धा से याद करें और उनके निमित्त कुछ अर्पित करें | हिन्दू धर्म में वैसे भी माता-पिता को भगवान का दर्जा प्राप्त है | अतः पितृ पक्ष का धार्मिक और सामाजिक दोनों महत्त्व है |

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