पराई स्त्री से संबंध बनाने में दोषी नहीं होगा पुरुष : सर्वोच्च न्यायालय

पराई स्त्री से संबंध में दोषी नहीं रहेगा पुरुष


विवाह के बाद संबध बनाने के मामले की सुनवाई करते हुए सप्रीम कोर्ट ने आईपीसी की धारा 497 को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया।



मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त किया।



सुप्रीम कोर्ट ने आज जिस अडल्ट्री कानून ‘धारा-497’ (विवाह के बाद संबध बनाने) पर अपना फैसला सुनाया है वह कानून करीब 158 साल पुराना है। अंग्रेजी शासन के दौरान 1860 में भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड) का ड्राफ्ट तैयार किया गया था। अपराध को कानूनी रूप से परिभाषित करने और उसके लिए सजा का प्रावधान करने वाला यह ड्राफ्ट ब्रिटिश इंडियन गवर्नमेंट द्वारा 1834 में स्थापित पहले लॉ कमिशन की अनुशंसा के आधार पर तैयार किया गया था। भारत में अंग्रेजी शासन के लॉ कमिशन के पहले अध्यक्ष थॉमस बबिंगटन मैकाले थे।



1862 से यह कनून ब्रिटिश इंडियन गवर्नमेंट के इलाकों में लागू हो गया था। 1940 तक भारतीय रियासतों में यह कानून जबरन लागू नहीं किया गया था क्योंकि भारतीय रियासतों के पास उनकी अपनी कानून व्यवस्था थी और अपने न्यायालय थे। इंडियन पीनल कोर्ड 1860 में अब तक कई संशोधन हो चुके हैं। भारतीय परंपरा और मौजूद धर्मों की मान्यताओं को देखते हुए आईपीसी में एक पुरुष द्वारा दूसरे पुरुष की पत्नी से सहमति से संबंध बनाना अपराध माना गया है। इस अपराध को आईपीसी की धारा 497 में परिभाषित किया गया है। इस धारा के तहत दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को पांच साल तक की जेल हो सकती है। हालांकि इस अपराध में अपराध करने वाले सिर्फ पुरुष को ही सजा मिलने का प्रावधान था।



विवाह के बाद संबंध अब अपराध नहीं-
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने अडल्ट्री पर अपना फैसला सुनाते हुए आईपीसी की धारा 497 को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। यानी अब कोई पुरुष या महिला गैर पुरुष या महिला के साथ सहमति से संबंध बनाता है तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा।

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